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यह आकाशवाणी का कोडरमा केंद्र है फरमाइशी गानों के लिए घंटों इंतजार करते थे लोग, दुकान खोलने और बंद करने का जरिया था रेडियो

यह आकाशवाणी का कोडरमा केंद्र है फरमाइशी गानों के लिए घंटों इंतजार करते थे लोग, दुकान खोलने और बंद करने का जरिया था रेडियो

आज विश्व रेडियो दिवस है. रेडियो का सफर भले ही आज दूसरे विकल्पों के साथ साथ मोबाईल में सिमट गया है लेकिन एक समय ऐसा था जब दहेज के रूप में दूल्हे को उपहार के रूप में ससुराल से साइकिल और घड़ी के साथ साथ रेडियो भी दिया जाता था. उस वक्त रेडियो की डिमांड थी लेकिन अब यह काफी कम हो गई है.

कोडरमा: यह आकाशवाणी का कोडरमा केंद्र है और आइये अब सुनते हैं फरमाइश के नगमे. पहली फरमाइश आई है रांची से अतुल की और इन्होंने बागबान फिल्म के मैं यहां तू वहां गाने की फरमाइश की है, तो अतुल पेश है आपकी फरमाइश. ना जाने कितने फरमाइश अब सिर्फ पन्नों में दर्ज हो चुके हैं. अब फरमाइश करने वाले भी शायद कम हो गए और सुनने वाले भी. सिर्फ कहीं-कहीं यह फरमाइश सुनी जाती है. टेलीविजन और यू-ट्यूब की दुनिया कहीं गुम होता चला गया रेडियो. एक जमाना था जब अमीन सयानी ने फरमाइश के दम पर हजारों-लाखों दोस्त बनाए थे. एक गाना सुनने के लिए चिट्ठियां लिखी जाती थी साहब. वो भी एक दौर था, ये भी एक दौर है. बदलते दौर के साथ रेडियो कहीं गुम होता चला गया. लोग सुनते तो आज भी हैं लेकिन वो चाहत पहले जैसी नहीं रही. बात रेडियो की इसलिए क्योंकि आज रेडियो दिवस है. वहीं रेडियो जिसमें फरमाइश के लिए लोग घंटों इंतजार करते थे.
गीतों की फरमाइश करने वाले रामेश्वर मोदी, गंगालाल मगधिया, राजेंद्र प्रसाद, जगन्नाथ साहू, पवन कुमार अग्रवाल और ऐसे कई नाम अब इस दुनिया में नहीं हैं. परिवार वालों ने उनकी यादों को संजोए रखा है. गंगा लाल के बेटे अंजनी बताते हैं कि उनके पिता हर रोज एक पोस्ट पर फरमाइशी गीत और परिवार का नाम लिखकर पोस्ट करते थे. रेडियो पर नाम सुनकर काफी खुशी मिलती थी. गंगा लाल मगधिया के छोटे भाई किशोरी मगधिया बताते हैं कि भले ही आज फरमाइशी गीतों के कार्यक्रम का प्रसारण विविध भारती से नहीं होता है, लेकिन हजारीबाग आकाशवाणी केंद्र से फिल्मी गीतों को सुनने के लिए वे टेलीफोन और पत्र के माध्यम से आज भी गानों की डिमांड करते हैं.

एक समय ऐसा था जब लोगों के हाथों में घड़ी कम दिखती थी और रेडियो पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों के जरिए ही लोगों को समय का आभास होता था. ओवर ब्रिज के नीचे चाय की दुकान चलाने वाले श्रीकांत सिंह बताते हैं कि वो 1985 से अपनी चाय की दुकान चला रहे हैं और उस वक्त लोगों के पास घड़ी नहीं होती थी. वो भी रेडियो पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों के समय के अनुसार ही अपनी दुकान खोलते थे और जब रेडियो पर प्रसारण बंद हो जाता था तब वह दुकान रात में बंद किया करते थे.
रेडियो का सफर भले ही आज दूसरे विकल्पों के साथ साथ मोबाइल में सिमट गया है लेकिन एक समय ऐसा था जब दहेज के रूप में दूल्हे को उपहार के रूप में ससुराल से साइकिल और घड़ी के साथ साथ रेडियो भी दिया जाता था. उस वक्त रेडियो की डिमांड थी लेकिन अब यह काफी कम हो गई है. इलेक्ट्रॉनिक दुकान चलाने वाले प्रदीप कुमार साव बताते हैं कि 15-20 साल पहले उनका दुकान रेडियो से भरा होता था लेकिन अब डिमांड ना के बराबर है.

शायद ही आज का युवा वर्ग रेडियो के मनोरंजन से वाकिफ हो. पल-पल बदलती दुनिया और यू-ट्यूब के एक टच से बदलते गाने में वो रेडियो का मजा नहीं है साहब. कभी घंटों कान से चिपकाए बैठते थे लोग. चाय की दुकान पर सुबह से कब शाम हो जाती पता नहीं चलता. वक्त बदल गया है, रेडियो भी बदल गया है.