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सहायक पुलिसकर्मियों को सताने लगा है नक्सलियों का भय, करो या मरो का चुन सकते हैं रास्ता

अनुबंध समाप्त होने और सरकार की ओर से अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने पर सहायक पुलिसकर्मियों को नक्सलियों का भय सताने लगा है. उनके सामने सरकार से अपनी नौकरी सुनिश्चित कराने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गयी है.

गढ़वा: अनुबंध समाप्त होने और सरकार की ओर से अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने पर सहायक पुलिसकर्मियों को नक्सलियों का भय सताने लगा है. इस कारण वह घर वापस जाना नहीं चाहते हैं. उनके सामने सरकार से अपनी नौकरी सुनिश्चित कराने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गयी है. इसमें असफल होने पर वह अपनी जान दे देने की भी बात कर रहे हैं.
बता दें कि झारखंड के बेरोजगार युवा तेजी से नक्सली संगठन से जुड़ रहे थे और सरकार के सामने चुनौती पैदा कर रहे थे. 2017 में तत्कलीन भाजपा सरकार ने झारखंड के नक्सल प्रभावित 12 जिले के युवक-युवतियों को नक्सलियों के प्रभाव से बचाने और उनका नक्सलियों के खिलाफ इस्तेमाल के लिए सहायक पुलिस के रूप में तीन साल के लिए अनुबंध के आधार पर नियुक्त किया था. सरकार ने अधिसूचना जारी कर तीन साल बाद उन्हें आरक्षी के पद पर स्थायी रूप से नियुक्त करने की घोषणा की थी.
सहायक पुलिस के रुप में गढ़वा के नक्सल प्रभावित क्षेत्र की 64 युवतियों सहित 180 युवकों को सहायक पुलिसकर्मी के रूप में नियुक्त किया गया था. इनका इस्तेमाल बूढ़ा पहाड़ जैसे नक्सली ठिकानों सहित कई नक्सली इलाकों में किया गया. जेल में छापेमारी से लेकर अन्य आपराधिक अभियान में भी इन्हें शामिल किया गया. आरक्षी के रुप में नियुक्त होने का उनका सपना उस समय चकनाचूर हो गया, जब तीन साल पूर्ण होने पर उनका अनुबंध ही रद्द कर दिया गया. सरकार से नाराज सहायक पुलिसकर्मी रांची में जमे हुए हैं और सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं.
सहायक पुलिसकर्मियों का कहना है कि वह नक्सल प्रभावित क्षेत्र से आते हैं. नक्सलियों के खिलाफ वह अभियान में शामिल हुए हैं. वह घर लौटते हैं तो नक्सली उन्हें जिंदा नहीं छोड़ेंगे. सरकार उन्हें नक्सलियों का दुश्मन बनाकर मरने के लिये मजबूर कर दिए हैं. वह घर नहीं जायेंगे, सरकार से ही लड़ेंगे और लड़ते-लड़ते मर जायेंगे.