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सीता-राम की ऐतिहासिक निशानी, वनवास के दौरान ईचागढ़ क्षेत्र में भी गुजारे थे दिन

Ambuj Kumar Kunal Sarangi width Anshar Khan ADJ Kamlesh Jitendra Rais Rozvi Rishi Mishra Rina Gupta

सरायकेला के सोनार पातकुम में भगवान राम और सीता माता के साक्ष्य मिले हैं. यहां के लोगों का मानना है कि भगवान राम अपने चौदह वर्ष के वनवास के दौरान यहां आए थे और कुछ दिन यहां बिताया था.

सरायकेला: मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने चौदह वर्षों के वनवास के दौरान सरायकेला जिले के ईचागढ़ क्षेत्र में दिन गुजारे थे. इस दौरान उन्होंने इस क्षेत्र में ना सिर्फ दिन गुजारे बल्कि कई ऐसे काम भी किए जिनकी कई ऐतिहासिक निशानी क्षेत्र में आज भी मौजूद है. मान्यताओं पर आधारित इससे संबंधित कई दंतकथाएं क्षेत्र में आज भी सुनी और सुनाई जाती है.
जमशेदपुर शहर से करीब 70 किलोमीटर पश्चिम-उत्तर की ओर स्थित ईचागढ़ के आदरडीह गांव की सीमा पर स्थापित माता सीता के मंदिर पर लोगों का अटूट विश्वास है. कुछ भक्त रोज मंदिर में पहुंचकर माता सीता का दर्शन-पूजन करते हैं. रामायण काल के अलावा क्षेत्र में महाभारत काल की भी कुछ निशानियां यहां मौजूद हैं. इनमें सबसे महत्वपूर्ण जयदा मंदिर के पास खेलने के लिए चट्टान पर बनाए गए निशान और शिलालेख भी हैं. मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने भी इसी क्षेत्र में दिन गुजारे थे
ईचागढ़ प्रखंड के चितरी, आदरडीह और चिमटिया के सीमा पर स्थित चट्टान पर माता सीता के पैर के निशान तो कुकडू प्रखंड के पारगामा क्षेत्र में भगवान श्रीराम के तीर की नोक से खोदे गए जलस्रोत लोगों के लिए कौतूहल का विषय बना हुआ है. क्षेत्र में प्रचलित दंतकथा के अनुसार वनवास के दौरान भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण इस क्षेत्र में भी दिन बिताए थे. कहते हैं कि एक दिन माता सीता स्नान करने के लिए पानी की तलाश कर रही थी पानी नहीं मिलने पर उन्होंने प्रभु श्रीराम से पानी खोजने में मदद मांगी. प्रभु श्रीराम ने अपने धनुष-वाण से भूगर्भ जल का स्रोत निकाला, जहां माता सीता स्नान की. भूगर्भ जल के स्रोत से जो जलधाराबहने लगी उसे लोग अब सीता नाला के नाम से जानते हैं.
गर्मी के मौसम में भी सीता नाला का पानी नहीं सूखता है. जहां पर माता सीता ने स्नान किया था वहां अब भी जल का स्रोत निकलता रहता है. इसी नाला के किनारे एक अर्जुन का पेड़ था. कहते हैं कि माता सीता स्नान करने के बाद उसी अर्जुन के पेड़ की डाली पर अपने बाल रखकर सुखाई थी. उस पेड़ की डाली पर अंत तक बाल जैसे काले रेशे निकलते रहते थे
सीता नाला के चट्टानों पर अब भी पैरों के निशान हैं. यहां एक चट्टान पर तीन जोड़े और एक चट्टान पर दांए पैर का एक निशान मौजूद है. अभी बरसात के कारण नाला में पैर का निशान डुबा हुआ है, जिसे लोग माता सीता के पैरों का निशान मानकर पूजा-अर्चना करते हैं. इसी स्थान पर माता सीता का एक मंदिर है. मंदिर के अंदर माता सीता की प्रतिमा भी स्थापित है जिसका निर्माण 1977 में एक सेवानिवृत शिक्षक ने अपनी मनोकामना पूरी होने पर कराया था. कहते हैं कि यहां माता सीता का स्मरण कर मन्नत मांगने पर वह पूरी होती है. यहां प्रतिवर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर एक दिवसीय मेले का आयोजन होता है.
वनवास के दौरान प्रभु श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण इस क्षेत्र में भी आए थे. इस दौरान प्रभु ने यहां भी दिन गुजारा था. सीता नाला क्षेत्र के लोगों के लिए यह वरदान जैसा है. बाहर महीने पानी और इसका ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व खुशी का अनुभव कराती है. अर्जुन का पेड़ जिसकी डाली में माता सीता बाल रखकर सुखाई थी जो कुछ वर्ष पहले गिर गया और अब पेड़ की डाली पर बाल जैसा कुछ निकलता रहता था. माता के पैरों के निशान इसका प्रमाण है कि प्रभु श्रीराम अपने भाई और माता सीता के साथ इस क्षेत्र में आए थे.
कुकड़ू प्रखंड के पारगामा गांव में एक कुआं है जिसे लोग ‘सीताकुंड’ कहते हैं. मान्यता है कि वनवास के दौरान भगवान श्रीराम ने तीर की नोक से जलकुंड का निर्माण किया था. इस चुआं से बारह महीने निरंतर जलधारा बहती है. क्षेत्र में प्रचलित दंतकथा के अनुसार वनवास के दौरान माता सीता की प्यास बुझाने के लिए भगवान श्रीराम ने तीर की नोक से कुंड का निर्माण किया था. उस समय से उस चुआं से निरंतर जलधारा निकलती है. मात्र चार से पांच फीट की गहराई वाले चुआं से करीब आधा दर्जन गांवों के लोग अपनी प्यास बुझाते हैं. लोककथा के अनुसार इस चुआं का संबंध यहां से करीब लगभग नौ
किलोमीटर दूर पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिला के अयोध्या पहाड़ स्थित ”सीताकुंड’ है.
झारखंड राज्य से सटे पश्चिम बंगाल के बाघमुंडी स्थित अयोध्या पहाड़ की चोटी पर राम दरबार स्थापित है. इस भव्य मंदिर में संगमरमर की प्रतिमाओं की पूजा-अर्चना गांव के ही आदिवासी पुजारी सतीश लाया करते हैं. इस भव्य मंदिर का निर्माण करीब तीस वर्ष पहले पूर्वांचल कल्याण आश्रम, कोलकाता की ओर से कराया गया था. इससे पूर्व यहां मिट्टी से बने मंदिर में मिट्टी की ही प्रतिमा स्थापित थी.
पुजारी सतीश लाया बताते हैं कि उनका परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी लोग प्रभु श्रीराम की सेवा में लगे हैं, पहले उनके पिता भीकु लाया पूजा-अर्चना करते थे. परदादा सातचरण लाया और दादा मनी लाया मंदिर में पूजा करते थे. बता दें कि राम मंदिर तीन बीघा में फैला है. सतीश लाया बताते हैं कि पूर्वजों से सुना है कि वनवास के दौरान प्रभु श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण इस क्षेत्र में पहुंचे थे. कहते हैं कि प्रभु श्रीराम अपनी पत्नी और भाई के साथ यहीं पेड़ के नीचे रहते थे. जंगल के चारों ओर मिट्टी का ढेर है, जैसे हजारों साल पहले किसी ने मिट्टी से मोटी चारदीवारी का निर्माण कराया हो.।

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