झारखण्ड वाणी

सच सोच और समाधान

मूक प्रेम

कुणाल सारंगी

गोल गोल बड़ी बड़ी आंखें थी उसकी। सुगठित शरीर, लंबा केश,गोरा रंग और उदास चेहरा। हां, ऐसा ही कुछ लगा था मुझे पहली नजरों में। शायद वह बहुत कुछ कहना चाहती मुझसे। उसका उदास चेहरा और बड़ी-बड़ी आंखें मुझे बराबर अपनी और आकर्षित कर करती थी। उसके उदास चेहरे में ही मासूमियत स्पष्ट झलकती थी। आंखें तो मानो दिल की हर बात चुपचाप कह देती थी। मैं असमंजस में पड़ा हर पल उसे निहारता ही रह जाता था। कब मेरा लगाव उससे हो गया था, यह मुझे भी नहीं पता।

लगभग 1 महीने बीत गए हम दोनों का, यह क्रम चलता रहा । मात्र कुछ क्षण के लिए हम दोनों एक दूसरे को देख लिया करते थे। बातें अभी तक नहीं हुई थी। मैं समझता था कि शायद वह हिंदी नहीं जानती है । अचानक एक दिन मैंने देखा कि जिस मरीज को लेकर वह आई है, उसे अस्पताल से छुट्टी मिल गई है और वह पहिये वाली कुर्सी पर अपने कमरे से निकलकर इधर उधर घूमने जाया करती है और वह लड़की पहिये वाली कुर्सी को पीछे से ठेलते हुए साथ साथ जाती है। किसी ने मुझे यह बताया कि वह मरीज और कोई नहीं, उस लड़की का पति है। मेरे सीने में हुक सा उठा । फिर यह भी मुझे मालूम हो गया कि शादी हुए ही यही कोई 7, 8 महीने हुए हैं। मन में एक धक्का सा लगा। अब उसके चेहरे की उदासी का अर्थ समझ में आने लगा।

शादी के कुछ ही दिन बाद पता चला कि उसे ब्रेन ट्यूमर है। ऑपरेशन सफल रहा, बुखार तो ठीक हो गया। परंतु शरीर की कमजोरी बनी रही। विधवा का दुख तो सभी लोग अनुभव कर सकते हैं, परंतु इस सधवा के दुख का किसको पता। मेरे मन उदास रहने लगा। उसकी आंखों की भाषा ज़ुबानों की भाषा से ज्यादा प्रखर मालूम पड़ने लगी । कई बार उस लड़की के ससुर से मेरी मुलाकात होती थी। परंतु बातचीत कभी नहीं हुई। बस आंखों का ही परिचय भर था। बाद में मुझे पता चला कि उस लड़की का पति और ससुर अच्छी तरह से हिंदी बोलना जानते थे और लड़की भी हिंदी सीखने की कोशिश कर रही थी।

उस दिन जाने से पहले मेरी ओर अपनी बड़ी बड़ी गोल आंखों से विषाद भरी नजरों से मुझे देखा और गाड़ी में चढ़ने से पहले वापस जाकर मेरे रूम में मां से अपनी टूटी-फूटी हिंदी में कही कि मैं जा रही हूं और चुपचाप आकर गाड़ी में बैठ गई । मैं भी पीछे से गाड़ी के पास पहुंच गया। गाड़ी चल दी। अचानक लड़की के ससुर ने कार से अपना हाथ निकाल कर मेरी ओर हिलाया । मैंने भी अपना हाथ ऊपर उठाकर दिला दिया । मेरा मन अचानक प्रफुल्लित हो उठा । उसी समय हृदय के किसी कोने में यह भी शंका उठी कि वह भला आदमी क्या सब कुछ जानता था? फिर मैंने अपने मन से यह विचार परे धकेल दिया क्योंकि उस लड़की के मूक प्रेम की धरोहर अभी भी मेरे हृदय में कायम है।