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मधुबनी पेंटिंग्स के स्टाइल दो तरह की होती हैं, कैसे बनाई जाती हैं

कुणाल सारंगी

मधुबनी : मधुबनी पेंटिंग्स दो तरह की होती हैं. एक भित्ति-पेंटिंग जो घर की दीवारों (मैथिली में दीवारों को भित्ति भी कहते हैं) पर बनाई जाती है और दूसरी अरिपन, जो घर के आंगन में बनाई जाती है. इन पेंटिंग्स को माचिस की तीली और बांस की कलम से बनाया जाता है. चटख रंगों का खूब इस्तेमाल होता है, जैसे गहरा लाल, हरा, नीला और काला. चटख रंगों के लिए अलग-अलग रंगों के फूलों और उनकी पत्तियों को तोड़कर उन्हें पीसा जाता है. फिर उन्हें बबूल के पेड़ की गोंद और दूध के साथ घोला जाता है.

पेंटिंग्स में कुछ हल्के रंग भी यूज होते हैं, जैसे पीला, गुलाबी और नींबू रंग. खास बात ये है कि ये रंग भी हल्दी, केले के पत्ते और गाय के गोबर जैसी चीजों से घर में ही बनाए जाते हैं. लाल रंग के लिए पीपल की छाल यूज की जाती है. आमतौर पर ये पेंटिंग्स घर में पूजाघर, कोहबर घर (विवाह के बाद का पति-पत्नी का कमरा) और किसी उत्सव पर घर की दीवार पर बनाई जाती हैं. हालांकि, अब इंटरनेशनल मार्केट में इसकी डिमांड देखते हुए कलाकार आर्टीफीशियल पेंट्स भी यूज करने लगे हैं और लेटेस्ट कैनवस पर बनाने लगे हैं.

मधुबनी पेंटिंग के स्टाइल

भरनी, कचनी, तांत्रिक, गोदना और कोहबर. ये मधुबनी पेंटिंग्स के पांच स्टाइल हैं. भरनी, कचनी और तांत्रिक पेंटिंग स्टाइल के धार्मिक तरीके हैं, जिसकी शुरुआत मधुबनी की ब्राह्मण और कायस्थ महिलाओं ने की थी. 1960 में दुसाध (एक दलित समुदाय) महिलाओं ने भी इन पेंटिंग्स को नए अंदाज में बनाना शुरू किया. उनकी पेंटिंग में राजा सह्लेश की झलक दिखाई देती है. दुसाध समुदाय के लोग राजा सह्लेश को अपना कुल देवता मानते हैं. हालांकि, आज मधुबनी पेंटिंग्स पूरी दुनिया में धूम मचा रही हैं और कास्ट, रिलीजन और एरिया जैसे पैमानों से से उपर उठ चुकी है. अब आर्टिस्ट इंटरनेशनल मार्केट का रुख देखते हुए आर्ट में एक्सपेरिमेंट भी कर रहे हैं, जिनके नए स्टाइल निकल रहे हैं.