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जन्मदिन पर विशेष, मनोहर श्याम जोशी की शख़्सियत से रूबरू करता पालतू बोहेमियन

Ambuj Kumar Kunal Sarangi width Anshar Khan ADJ Kamlesh Jitendra Rais Rozvi Rishi Mishra Rina Gupta

नवीन शर्मा।  जब आप कोई ऐसी किताब पढ़ रहे हों जिसके लेखक को आप जानते हों तो उस पुस्तक को पढ़ने का आनंद बढ़ जाता है। इसके बाद जब किताब ऐसे शख्स के बारे में हो जिसके लेखन के आफ कायल रहे हों तो ये आनंद दोगुना हो जाता है। प्रभात रंजन का मनोहर श्याम जोशी के बारे में संस्मरण पालतू बोहेमियन पढ़ने के दौरान मुझे ऐसा ही आनंद मिला।
अस्सी के दशक में रांची जैसे छोटे शहर में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मौत के बाद दूरदर्शन का प्रसारण शुरू हुआ था। इसी दौर में दूरदर्शन पर मनोहर श्याम जोशी के लेखन के जादू से परिचित हुआ था। आलोक नाथ (मास्टर हवेली राम) और लाजो जी सहित अन्य कलाकारों के सहज अभिनय की वजह से बुनियाद धारावाहिक का शायद ही कोई एपीसोड छोड़ा होगा। इसी तरह हमलोग, कक्का जी कहीन और मुंगेरीलाल के हसीन सपने भी खूब पसंद किए जाने वाले धारावाहिक थे। इन सभी धारावाहिकों के लेखक मनोहर श्याम जोशी थे यानि वो टीवी सोप ओपेरा लेखन के सुपरस्टार थे। उनके जीवन और लेखन के बारे में पालतू बोहेमियन. कई रोचक और ज्ञानवर्धक बातें बताती है।

किताब पहुंचाने के बहाने जोशी जी से पहली मुलाकात

प्रभात रंजन जोशी जी पर ही पीएचडी कर रहे थे इसलिए उनसे मिलने गए थे। मिलने का बहाना बढ़िया उपलब्ध कराया लेखक उदय प्रकाश जी ने(मुझे कुछ माह पहले इनसे मिलने का सुअवसर मिला था) ने प्रभात को ब्रूनो शुल्ज का उपन्यास स्ट्रीट आफ क्रोकोडॉयलस जोशी जी को देने के लिए भेजा। ब्रूनो पोलैंड के लेखक थे जिनकी हत्या कर दी गई थी। इनके दो अन्य उपन्यासों में उत्तर आधुनिकता के आरंभिक बीज मिलते हैं। किताब देने के बहाने शुरू हुई मुलाकात का ये सिलसिला कई वर्षों तक चला। इसी दौरान प्रभात जोशी जी के काफी करीब आए।

अजमेर में हुआ था जन्म
मनोहर श्याम जोशी मूल रूप से कुमाऊनी ब्राह्मण थे मगर उनका जन्म अजमेर में हुआ था। इस वजह से राजस्थान की संस्कृति से उनका सहज लगाव था। वे खुद को राजस्थानी ही अधिक समझते थे। इसी वजह से उन्होंने मारवाड़ी नाम से धारावाहिक शुरू करने की योजना बनाई और उसके लिए #प्रभात_रंजन को भी रिसर्च टीम में रखा था। इसका नाम बदलकर शुभ लाभ कर दिया गया।

छोटी से छोटी बात पर बारीकी नजर रखते थे

प्रभात शुभ लाभ के दौरान का एक किस्सा बताते हैं
जिससे पता चलता है कि जोशी जी किसी भी चीज को कितनी बारीकी से देखते थे। प्रभात में एक सीन लिखा था की नायिका पार्कर पेन से लिख रही थी। बीसवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों का सीन था। उन्होंने टोक कर बताया कि भारत में पहले वाटर मैन पेन आया था पार्कर पेन बाद में आया। प्रभात बोले कि इतनी बारीकी की बात कौन समझेगा? जोशी जी ने कहा और कोई समझ जाएगा तो सोचो लेखक के रूप में मेरे क्या साख रह जाएगी।

पांच लाख का एडवांस लौटा दिया

जोशी जी का जलवा इतना था कि एक बार मनमोहन देसाई ने फिल्म की कहानी लिखने के लिए पांच लाख का चेक एडवांस में दिया था। पर कुछ दिन बाद ही अपने एक रिश्तेदार को चेक वापस लेने भेजा तो जोशी जी ने बिना हिचक के चेक लौटा दिया जबकि फिल्मी दुनिया में एडवांस वापसी करने का चलन नहीं था। कई लोगों का गुजारा भी एडवांस से चलता था।

गाथा बना अंतिम धारावाहिक
बहुत कम व्यक्ति इतने खुशकिस्मत होते हैं जो लंबे समय तक टॉप में बने रहते हैं। जोशी जी का भी करियर ढलान पर आने लगा था। स्टार टीवी पर प्रकाशित प्रसारित गाथा धारावाहिक उनका अंतिम धरावाहिक साबित हुआ। इस धारावाहिक के निर्देशक रमेश सिप्पी थे। रमेश सिप्पी के लिए मनोहर श्याम जोशी ने भ्रष्टाचार नाम की फिल्म भी लिखी थी। यह फिल्म चल नहीं पाई थी। जोशी जी ने अपने प्रिय अभिनेता अभिनव चतुर्वेदी को भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका दिलवाई थी। उनकी अंतिम फिल्म हे राम थी जो कमल हासन की थी। वैसे इन्होंने महेश भट्ट के लिए पापा कहते हैं फिल्म भी लिखी थी।

गुड़ खाते हुए चाय पीना, बोल कर लिखवाना

जोशी जी की एक मजेदार आदत थी वे चाय पीते हुए गुड़ के टुकड़े साथ खाते थे। इसके अलावा जोशी जी को बोलकर लिखने की आदत थी। शंभू सती कई वर्षों तक उनके लिए टाइपिंग का काम करते रहे। अमृतलाल नागर भी बोलकर ही लिखाते थे उन दिनों में बूंद और समुद्र उपन्यास लिख रहे थे उनके कुछ पन्ने जोशी जी ने भी लिखे थे। कमलेश्वर जो टीवी और फिल्मों के भी लिख रहे थे वे उंगली में पट्टी बांधकर लिखा करते थे। एक बार बातचीत में कमलेश्वर जी ने कहा कि जोशी जी के पहले दो उपन्यास #कुरु_कुरु_स्वाहा और कसप बहुत सुगठित हैं क्योंकि दोनों उसने हाथ से लिखे थे। जोशी जी के लेखन के खास बात यह भी दिखी कि वे लिखते समय शब्द कोष का उपयोग किया करते थे। वह कहते थे तुम हिंदी पट्टी वाले अपनी अंग्रेजी ठीक करने के लिए तो डिक्शनरी देखते हो लेकिन कभी यह नहीं सोचते कि हिंदी भाषा को भी ठीक करने के लिए कुछ देखना चाहिए।

कहानी से उपन्यास बना हमजाद

जोशी जी ने एक कहानी लिखी मेरा शर्म भी तू मेरा चैन भी तू। यह कहानी बाद में #हमजाद उपन्यास के रूप में परिवर्तित हो गई। यह उपन्यास उन्होंने 1 महीने में लिख दिया था। जोशी जी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्होंने #कसप उपन्यास भी महज 1 महीने में लिख लिया था। जोशी जी की लेखन के खास बात यह थी कि लिखने के पहले उधेड़बुन में भले महीनों बरसों पड़े रहते लेकिन एक बार जब कहानी राह पर आ जाती है तो उन्हें लिखने में अधिक समय नहीं लगता था। हमजाद उपन्यास के बारे में विद्यानिवास मिश्र ने जोशी जी को कहा कि अपने प्रयोग तो अच्छा किया है लेकिन यह उपन्यास हिंदी की प्रकृति के अनुरूप नहीं है। हिंदी साहित्य में कुछ आशा, कुछ विश्वास तो होना ही चाहिए आपके इस उपन्यास में चरम निराशा है।

अमेरिकन सेंटर लाइब्रेरी किताबों का खजाना

जोशी जी ने प्रभात को अमेरिकन सेंटर लाइब्रेरी का कार्ड दिया और वहां से पुस्तके लाने के लिए कहा था।
प्रभात ने एक बार जोशी जी के सामने कहा कि नामवर जी अब लिखना ही भूल गए यह सुनकर जोशी जी बड़े गुस्से में आ गए और उन्होंने कहा नामवर जी के बारे में कुछ बोलने से पहले सोच लिया करो। आज भी वे रात में एक किताब पढ़ कर सोते हैं। सात जन्म लोगे तब भी उनके जैसा पढ़ पाओगे या नहीं बताना मुश्किल है बल्कि इससे भी आगे बढ़ते हुए उन्होंने मुझे कहा कि किसी भी बड़े लेखक की आलोचना करने से अधिक उनसे कुछ सीखने का प्रयास करना चाहिए.।

उपभोक्तावाद विमर्श के केंद्र में आ गया

प्रभात बताते हैं कि उस दौर में उपभोक्तावाद विमर्श के केंद्र में आ गया था इसलिए वह मुझसे बार-बार कहते कि समय के साथ रहना तो हो तो अमेरिकी प्रकाशनों पर ध्यान रखो। एक जमाना था जब साहित्य के केंद्र में रूसी या कुर्सी साहित्य था। अब अमरीकी डंका साहित हो गया है इसलिए देखो बाजार बिक्री आदि को किताबों की सफलता का पैमाना बनाया जा रहा है। उन्हीं दिनों #अरुंधति_राय का उपन्यास #गॉड_ऑफ_स्मॉल_थिंग प्रकाशित हुआ था वे कहते थे इसमें कोई शक नहीं कि यह उपन्यास एक अच्छा उपन्यास है लेकिन ध्यान से देखोगे कि इसके पीछे बाजार के सभी मानक काम कर रहे थे लेखिका को सबसे अधिक रॉयल्टी से लेकर बुकर अवॉर्ड तक और मार्क्सवाद का मजाक उड़ाना तक।

लेखक ने पर्याप्त ईमानदारी बरती

किसी आत्मकथा और संस्मरणात्मक किताबों को पढ़ने में तब ज्यादा मजा आता है जब वो ईमानदारी से लिखी गई हो तथ्यों से छेड़छाड़ ना की गई हो और खुद को जबरन हीरो साबित करने की कोशिश ना की गई हो अपनी कमजोरियों पर भी बेबाकी से लिखा गया हो। पालतू बोहेमियन में प्रभात रंजन इन बातों पर अमल करते नजर आते हैं। वे साफगोई से स्वीकार करते हैं कि जोशी जी की ही सिफारिश पर उन्हें जनसत्ता में पहली नौकरी मिली थी पर जोशी जी का बड़प्पन देखिए की उन्होंने इस बात का जिक्र कभी नहीं किया। इसी तरह प्रभात ने खुद को काबिल लेखक साबित करने का भी प्रयास नहीं किया। उन्होंने यह बात भी ईमानदारी से बताई की जोशी जी के अंतिम दिनों में प्रभात उनसे कटे कटे रहने लगे थे और दुर्भाग्य से इसी दौर में जोशी जी की मौत भी हो गई।
अंत में लेखक की इश बात के लिए तारीफ करनी होगी कि वो रोचक अंदाज में किस्सागोई की शैली में बतियाते चलते हैं। वो उन्हीं घटनाओं और बातों का जिक्र करते हैं जो लिखने योग्य हैं। विवरण अनावश्यक विस्तार नहीं देते। यही वजह है कि कई तेजी से पढ़ने वाले पाठक एक बैठक में भी 135 पन्नों की किताब खत्म कर सकते हैं। हां मैं भी जोशी जी की इस राय से इत्तेफाक रखता हूं कि प्रभात आप संस्मरण अच्छा लिखते हैं।

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