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जब दुनिया ने मधुबनी पेंटिंग को जाना

कुणाल सारंगी

मधुबनी: मधुबनी पेंटिंग्स मिथिलांचल में हजारों सालों से चली आ रही हैं, पर 1934 से पहले ये सिर्फ गांवों की एक लोककला ही थी. 1934 में मिथिलांचल में बड़ा भूकंप आया था, जिससे वहां काफी नुकसान हुआ. मधुबनी के ब्रिटिश ऑफिसर विलियम आर्चर जब भूकंप से हुआ नुकसान देखने गए तो उन्होंने ये पेंटिंग्स देखीं, जो उनके लिए नई और अनोखी थीं. उन्होंने बताया, ‘भूकंप से गिर चुके घरों की टूटी दीवारों पर जो पेंटिंग्स हैं, वो मीरो और पिकासो जैसे मॉडर्न आर्टिस्ट की पेंटिंग्स जैसी थी’. फिर उन्होंने इन पेंटिंग्स की ब्लैक एंड वाइट तस्वीरें निकलीं, जो मधुबनी पेंटिंग्स की अब तक की सबसे पुरानी तस्वीरें मानी जाती हैं. उन्होंने 1949 में ‘मार्ग’ के नाम से एक आर्टिकल लिखा था’, जिसमें मधुबनी पेंटिंग की खासियत बताई थी. इसके बाद पूरी दुनिया को मधुबनी पेंटिंग की खूबसूरती का अहसास हुआ.

1977 में मोजर और रेमंड ली ओवेंस (उस समय के एक फुलब्राइट स्कॉलर) के फाइनेंशियल सपोर्ट से मधुबनी के जितबारपुर में ‘मास्टर क्राफ्ट्समेन असोसिएशन ऑफ मिथिला’ की स्थापना की गई. इसके बाद जितबारपुर मधुबनी पेंटिंग का हब बन गया. इससे लोकल मधुबनी पेंटिंग आर्टिस्ट्स को बहुत फायदा हुआ. उनकी कला को सही कीमत मिलने लगी. फोर्ड फाउंडेशन का भी मधुबनी पेंटिंग के साथ लंबा असोसिएशन रहा. अब तो बहुत से इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन मधुबनी पेंटिंग्स को इंटरनेशनल मार्केट में पहुंचा रहे हैं.