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इंकलाब जिंदाबाद का अर्थ क्या है और यह नारा पहली बार कब और किसने लिखा था

कुणाल सारंगी

74 साल पहले हिंदुस्तान के हर रास्ते पर एक नारा गुंजा करता था। उस दौरान बच्चा-बच्चा इस नारे को अपनी जुबान पर लिए घूमता था। आजादी के लिए लड़ने वाले क्रांतिकारी भाई इसी नारे के दम पर अंग्रेज पुलिस अफसरों के लात-घूंसे और मार खाया करते थे। यहीं वो नारा था जिसने अंग्रेजी हुकूमत को हिलाकर रख दिया था और वो इससे डर कर क्रांतिकारियों पर और जुल्म ढ़ाने लगी। ये नारा था ‘इंकलाब जिन्दाबाद’ का।

और इसका मतलब होता है ‘क्रांति अमर रहे’ अंग्रेजी में कहते हैं ‘Long Live Revolution’। इस नारे को भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी साथियों ने दिल्ली की असेंबली में साल 1929, 8 अप्रेल को एक आवाजी बम फोड़ते वक्त बुलंद किया था और इतना बुलंद कर दिया था कि देश की आजादी तक सिर्फ यही नारा गुंजा करता था और आज भी सुनाई देता है। दरअसल, यह नारा मशहूर शायर हसरत मोहानी द्वारा एक जलसे में आजादी-ए-कामिल की बात करते हुए दिया गया था। तब कोई इसका ज्यादा इस्तेमाल नहीं करता था।

इस नारे पर देश के लोगों ने तब दम दिखाया जब हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की गतिविधियों को और विशेष रूप से अशफाकुल्लाह ख़ाँ, भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद ने इसको प्रेरित किया। स्वतंत्रता आंदोलन के तारीखवार भारतीय राजनीतिक उपन्यासों में इस स्वतंत्रता समर्थक के दौरान इस नारे के इस्तेमाल करने वालों की एक सुची भी है, जिसमें बताया गया है कि इस नारे को स्वतंत्रता के दौरान किस-किस ने बुलंद किया था।

आजादी की लड़ाई में हमने कई वीर क्रांतिकारियों भाईयों को खोया है। आजादी की उस लड़ाई में सिर्फ एक नारे ने पूरे देश को बांध कर रखा था और वो नारा यही था ‘इंकलाब जिंदाबाद’। वैसे ये नारा आज भी देश के लोगों के मुंह पर लगा हुआ है। आज भी देश में जब लोगों धरना देते है या किसी के लिए इंसाफ मांगते हैं तो इस नारे को बुलंद जरूर करते हैं, लेकिन बहुत ही कम लोग ये जाते होंगे कि इन नारे को किसने लिखा था। चलिए आपको बताते हैं।

किसने लिखा यह नारा

सबसे पहली बार ये नारा Mexican Revolution के समय Viva la Revolution के नाम से शुरू हुआ, जिसका मकसद था लोगों में चेतना पैदा करना जिससे वो सरकार के द्वारा हो रहे जुल्मों के खिलाफ लड़ सकें। Mexican Revolution के इस नारे का असर इतना ज्यादा हुआ कि कई दूसरे देशों में भी इस नारे का इस्तेमाल अपने-अपने ढंग होना शुरू हुआ । वहीं हिंदुस्तान में इस नारे को ‘इंकलाब जिंदाबाद’ (Inquilab Zindabad) का नाम दिया गया |

किसने दिया ये नाम

‘इंकलाब जिंदाबाद’ के इस नाम को मशहूर उर्दू शायर मौलाना हसरत मोहनी ने इजात किया, जो एक क्रांतिकारी साहित्यकार, शायर, पत्रकार, इस्लामी विद्वान और समाजसेवक थे। उर्दू भाषा के कवि हसरत मोहानी इस नारे के असली जन्म दाता हैं। यह नारा उन्ही की कलम द्वारा साल 1921 में लिखा गया था, जिसे साल 1929 में भगत सिंह ने पहली बार एक बुलंद आवाज में तब्दील कर दिया हमेशा-हमेशा के लिए।

जब भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने एक संपादक को इसका अर्थ समझाया था…
शहीद यतिन्द्रनाथ दास 43 दिन की भूख हड़ताल के बाद शहीद हो गए थे। वहीं Modern Review के एक संपादक रामानंद चट्टोपाद्ध्याय ने उनकी शहादत के बाद भारतीय जनता द्वारा शहीद के प्रति किए गये सम्मान और उनके ‘इंकलाब जिन्दाबाद’ के नारे की आलोचना करते हुए एक आर्टिकल लिखा था। उसी का जवाब देते हुए जब भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने संपादक को ‘इंकलाब जिन्दाबाद’ का अर्थ समझाया था।

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त का पत्र

श्री संपादक जी,
माडर्न रिव्यू,

आपने अपने सम्मानित पत्र के दिसंबर, 1929 के अंक में एक टिप्पणी “इंकलाब जिन्दाबाद” शीर्षक से लिखी है और इस नारे को निरर्थक ठहराने की चेष्टा की है। आप सरीखे परिपक्व विचारक तथा अनुभवी और यशस्वी की रचना में दोष निकालना तथा उसका प्रतिवाद करना, जिसे प्रत्येक भारतीय सम्मान की दृष्टी से देखता है, हमारे लिये बड़ी धृष्टता होगी। तो भी इस प्रश्न का उत्तर देना हम अपना कर्तव्य समझते हैं कि इस नारे से हमारा क्या अभिप्राय है?

यह आवश्यक है, क्यूं कि इस देश में इस समय इस नारे को सब लोगों तक पहुंचाने का कार्य हमारे हिस्से में आया है। इस नारे की रचना हमने नहीं की है। यही नारा रूस के क्रान्तिकारी आंदोलन में प्रयोग किया गया है। प्रसिद्ध समाजवादी लेखक अप्टन सिंक्लेयर ने अपने उपन्यासों “बोस्टन और आईल” में यही नारा कुछ अराजकतावादी क्रांतिकारी पात्रों के मुख से प्रयोग कराया है। इसका अर्थ क्या है? इसका यह अर्थ कदापि नहीं है सशत्र संघर्ष सदैव जारी रहे और कोई भी व्यवस्था अल्प समय के लिये भी स्थाई न रह सके। दूसरे शब्दों में देश और समाज में अराजकता फ़ैली रहे।

दीर्घकाल से प्रयोग में आने के कारण इस नारे को एक ऐसी विशेष भावना प्राप्त हो चुकी है, जो संभव है, भाषा के नियमों एवं कोष के आधार पर इसके शब्दों से उचित तर्कसम्मत रूप में सिद्ध न हो पाए, परंतु इसके साथ ही इस नारे से उन विचारों को पृथक नहीं किया जा सकता, जो इनके साथ जुड़े हुए हैं। ऐसे समस्त नारे एक ऐसे स्वीकृत अर्थ के द्योतक हैं, जो एक सीमा तक उनमें उत्पन्न हो गए हैं तथा एक सीमा तक उनमें नीहित हैं।

उदाहरण के लिये हम यतिन्द्रनाथ जिन्दाबाद का नारा लगाते हैं। इससे हमारा तात्पर्य यह होता है उनके जीवन के महान आदर्शों तथा उस अथक उत्साह को सदा-सदा के लिये बनाए रखें, जिसने इस महानतम बलिदानी को उस आदर्श के लिए अकथनीय कष्ट झेलने एवं असीम बलिदान करने की प्रेरणा दी। यह नारा लगाने से हमारी यह लालसा प्रकट होती है कि हम भी अपने आदर्शों के लिये अचूक उत्साह को अपनाएं। यही वह भावना है, जिसकी हम प्रशंसा करते हैं।

इस प्रकार हमें “इंकलाब” शब्द का अर्थ भी कोरे शाब्दिक रूप में नहीं लगाना चाहिये। इस शब्द का उचित एवं अनुचित प्रयोग करने वाले लोगों के हितों के आधार पर इसके साथ विभिन्न अर्थ एवं विभिन्न विशेषताएं जोड़ी जाती हैं। क्रांतिकारी की दृष्टि में यह एक पवित्र वाक्य है। हमने इस बात को ट्रिब्युनल के सम्मुख अपने वक्तव्य में स्पष्ट करने का प्रयास किया था।

इस वक्तव्य में हमने कहा था कि- क्रांति (इंकलाब) का अर्थ अनिवार्य रूप से सशत्र आंदोलन नहीं होता। बम और पिस्तौल कभी-कभी क्रांति को सफ़ल बनाने के साधन मात्र हो सकते हैं। इसमें भी संदेह नहीं है कि कुछ आन्दोलनों में बम एवं पिस्तौल एक महत्वपूर्ण साधन सिद्ध होते हैं, परन्तु केवल इसी कारण से बम और पिस्तौल क्रान्ति के पर्यायवाची नहीं हो जाते। विद्रोह को क्रांति नहीं कहा जा सकता, यद्यपि यह हो सकता है कि विद्रोह का अंतिम परिणाम क्रांति हो।

इस वाक्य में “क्रान्ति” शब्द का अर्थ “प्रगति के लिए परिवर्तन की भावना एवं आकांक्षा” है। लोग साधारण जीवन की परंपरागत दशाओं के साथ चिपक जाते हैं और परिवर्तन के विचार मात्र से ही कांपने लगते हैं। यही एक अकर्मण्यता की भावना है, जिसके स्थान पर क्रांतिकारी भावना जाग्रत करने की आवश्यकता है।

दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि “अकर्मण्यता का वातावरण निर्मित हो जाता है और रूढ़ीवादी शक्तियां मानव समाज को कुमार्ग पर ले जाती हैं।”

क्रान्ति की इस भावना से मनुष्य जाति की आत्मा स्थाई तौर पर ओत-प्रोत रहनी चाहिए, जिससे कि रूढ़िवादी शक्तियां मानव समाज की प्रगति की दौड़ में बाधा डालने के लिये संगठित न हो सकें। यह आवश्यक है कि पुरानी व्यवस्था सदैव न रहे और वह नई व्यवस्था के लिए स्थान रिक्त करती रहे, जिससे कि आदर्श व्यवस्था संसार को बिगाड़ने से रोक सके । यह है हमारा वह अभिप्राय जिसको ह्रदय में रख कर “इंकलाब जिन्दाबाद” का नारा ऊंचा करते हैं।

भगतसिंह, बी. के. दत्त
22 दिसंबर, 1929
[“सरदार भगतसिंह के राजनैतिक दस्तावेज”, संपादक चमनलाल व प्रकाशक नेशनल बुक ट्रस्ट, इन्डिया]