झारखण्ड वाणी

सच सोच और समाधान

फिर से झूठ उभरते देखा

फिर से झूठ उभरते देखा
*******************
जीत झूठ की जहाँ पे होती,
सच को वहीं तड़पते देखा।
अमृत – धारा, गंगाजल में,
अनगिन लाशें बहते देखा।।

जिन्दा थे तो लड़ा झूठ से,
हरदम झूठ सिहरते देखा।
मरे जहाँ तो गिनती तक में,
फिर से झूठ उभरते देखा।।

जीत झूठ की जब भी होती
मानव-मूल्य को मरते देखा।
झूठों को ही सुख सुविधा भी,
हँस हँस उसे गुजरते देखा।।

जब जन जन बेहाल झूठ से,
सच को यार ठहरते देखा।
लोक चेतना जगती है तब,
फिर से झूठ बिखरते देखा।।

सत्यमेव जयते ही सच है,
सुमन झूठ को मरते देखा।
सच्चाई की राह कठिन पर
सबको यहीं निखरते देखा।।

श्यामल सुमन