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भारत का संविधान के मौलिक अधिकारों (प्रास्तवाना) के संरक्षण केशवानंद भारती नहीं रहे

संविधान के ‘मूल संरचना सिद्धांत’ का निर्धारण करने वाले केस के प्रमुख याचिकाकर्ता रहे केशवानंद भारती का रविवार सुबह केरल के कासरगोड जिले के एडानेर स्थित उनके आश्रम में निधन हो गया। 79 वर्षीय केशवानंद भारती केरल के कासरगोड़ में एडनीर मठ के प्रमुख थे। बता दें कि साल 1973 में उनके और केरल सरकार के बीच चले केस के फैसले ने उनकी पूरे भारत में अलग पहचान बनाई थी। इसी फैसले के बाद सम्पति का अधिकार सुरक्षित हुआ था । इनका मुकदमा संविधान विशेषज्ञ नानी पालिकी वाला सुप्रीमकोर्ट में लड़ा था

क्या था मामला जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था ऐतिहासिक फैसला?

केरल की तत्कालीन वामपंथी सरकार ने भूमि सुधार मुहिम के तहत जमींदारों और मठों के पास मौजूद हजारों एकड़ की जमीन अधिगृहीत कर ली थी। सरकार का तर्क था कि वो जमीनें लेकर आर्थिक गैर-बराबरी कम करने की कोशिश कर रही है। इस सरकारी फैसले को तब युवा संत ने चुनौती दी थी। इसकी चपेट केशवानंद के एडनीर मठ की संपत्ति भी आ गई। मठ की सैकड़ों एकड़ की जमीन सरकार की हो चुकी थी। केशवानंद भारती ने केरल सरकार के इस फैसले को अदालत में चुनौती दी।

केशवानंद ने कोर्ट में याचिका दखिल कर अनुच्छेद 26 का हवाला देते हुए दलील दी थी कि मठाशीध होने के नाते उन्हें अपनी धार्मिक संपत्ति को संभालने का हक है। इतना ही नहीं संत ने स्थानीय और केंद्र सरकार के कथित भूमि सुधार तरीकों को भी चुनौती दी थी। हालांकि केरल हाईकोर्ट में उनकी याचिका खारिज हो गई थी तब केशवनंद ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में 13 जजों की संवैधानिक बेंच ने केशवानंद भारती के पक्ष में फैसला दिया था।

क्या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
केशवानंद की याचिका पर 23 मार्च 1973 को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। 13 जजों की संवैधानिक बेंच ने 7:6 के बहुमत से फैसला सुनाया था जिसमें कहा गया था कि संसद संविधान में वहीं तक बदलाव कर सकती है, जहां वह संविधान के बुनियादी ढांचे पर असर न डालें। यह मामला आज भी मिसाल माना जाता है।

केशवानंद को ‘केरल का शंकराचार्य’ भी कहा जाता है। वर्ष 1973 में ‘केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य’ का फैसला करीब 48 साल बाद भी प्रासंगिक है और दुनिया की कई अदालतों में कोट किया जाता है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के 16 साल बाद बांग्लादेश की सुप्रीम कोर्ट ने ‘अनवर हुसैन चौधरी बनाम बांग्लादेश’ में मूल सरंचना सिद्धांत को भी मान्यता दी थी। ‘केशवनंद भारती बनाम केरल राज्य’ केस के ऐतिहासिक फैसले के अनुसार, ‘संविधान की प्रस्तावना के मूल ढांचे को बदला नहीं जा सकता।’ फी लीगल एड कमिटी के चेयरमैन प्रेम चन्द्र ने महान संन्त श्री केशवानन्द भारती ब्रम्हलीन हुये के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है और कहा कि भारतीय लोकतंत्र की मूल अवधारणा के इस महान रक्षक को भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के समर्थकों एवं समस्त मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की ओर से सादर नमन एवं कृतज्ञतापूर्वक हार्दिक श्रद्धाजंलि .. दी है।