झारखण्ड वाणी

सच सोच और समाधान

भार इस पदभार का

भार इस पदभार का
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कोशिशें पुरजोर उनकी, अपने ही विस्तार का
हाल बदतर कर दिया है, इस चमन गुलजार का

बागबां उसको बनाया, जो हुनर जाने नहीं
अब खुदाई कर रहे वो, पेड़ के आधार का

पहले सा रौशन बगीचा, देख पाएं क्या कभी?
अब यहाँ पर जंग जारी, जीने के अधिकार का

खाद, पानी, रौशनी तक, छिन गये हैं बाग के
माली, अपनी मौज में, करते सफर संसार का

पेड़, पौधे और सुमन, बच जाए तो गुलशन बचे
बागबां पर फिर नहीं दें, भार इस पदभार का

श्यामल सुमन