झारखण्ड वाणी

सच सोच और समाधान

बंध्याकरण चालू आहे

कुणाल सारंगी

बंध्याकरण चालू आहे
****************”
दशकों पहले “हम दो, हमारे दो” जैसे लोकप्रिय नारे के साथ जनसंख्या नियंत्रण के लिए देश भर में सरकारी अभियान चलाया गया जिसका देश को लाभ भी मिला
मगर इमरजेंसी काल में जबरन बंध्याकरण की कई घटनाएं प्रकाश में आयीं और सरकार की फजीहत भी हुई और तत्कालीन सरकारी दल को सत्ता भी गंवानी पड़ी।
अभी ईडी, सीबीआई आदि देश की स्वायत्त संस्थाओं का बेजा इस्तेमाल करके वर्तमान सरकार के विरुद्ध उठने वाली हर आवाज का बंध्याकरण खुलेआम किया जा रहा है और इसका सरकारी सदुपयोग भी विरोधी दलों की सरकारों को गिराकर देश के संघीय ढांचे का भी बंध्याकरण जारी है। आम भारतवासी की नजरों में तो कई बार न्यायिक प्रक्रिया भी इसी दायरे में दिखाई देती है।
दशकों से लाखों परिवार को रोजगार देने वाली और देश को लगातार मजबूती प्रदान करने वाली और पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा कठिन प्रयास से स्थापित सार्वजनिक संस्थाएं जैसे कोल,सेल, भेल, रेल, टेलिकॉम, एयरवेज, नवरत्न कम्पनियां आदि का “कुबेर-पुत्रों” के इशारे पर मनमर्जी से निजीकरण करके इसके बंध्याकरण की प्रक्रिया चालू है।
सत्ता के शीर्ष-गद्दी पर बैठे राजनैतिक दल के लोगों द्वारा उस दल के छुपे “एजेंडे” को अब डंके की चोट पर देश भर में लागू करने के लिए सरकारी कोशिशों से नयी शिक्षा प्रणाली के नाम पर बंध्याकरण किया जा रहा है जो खतरनाक है भविष्य के लिए। सरकारी स्कूलों और कॉलेजों का बंध्याकरण तो पहले ही किया जा चुका है।
इसी प्रकार सरकारी अस्पतालों में गरीब जनता को मुफ्त में मिलने वाली थोड़ी बहुत स्वास्थ्य सुविधाएं, कृषि प्रधान देश में किसानों को मिलने वाली कमोवेश सब्सिडी का भी नियमित बंध्याकरण चल ही रहा है।
सरकारी विज्ञापन और संरक्षण की लालच में हमारे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया भी आजकल सिर्फ “राग-सरकारी” ही गा रहा है जिससे आम भारतीयों की वैचारिकता का सामूहिक बंध्याकरण हो रहा है जो बेहद ख़तरनाक है हमारे देश के लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए। “वाट्सअप युनिवर्सिटी” की स्थापना के बाद लोगों के स्वतंत्र विचार और तेजी से मरने लगे हैं।
तो चलिए मित्रों इस बात की फ़िक्र किए बिना कि पड़ोस के श्रीलंका में क्या हुआ? मंहगाई डायन देश में और क्या क्या रूप दिखाएगी? बेरोज़गारी के “सुरसा-स्वरूप” से बिना डरे चाय की चुस्की के साथ हम सब मिलकर समेकित रूप से “राग-सरकारी” सुनें और “राग-दरबारी” गाएं क्योंकि सरकार विरोधी हर स्वर और आवाज को “देशद्रोह” की श्रेणी में रखा जा चुका है।

श्यामल सुमन