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अंग प्रदेश की समृद्धशाली व गौरवशाली इतिहास – दानवीर कर्ण की भूमि

कुणाल सारंगी

अंग का इतिहास काफी प्राचीन रहा है, अपनी समृद्धशाली विरासत और गौरवमयी गाथा के कारण अंग की धरती न केवल ऐतिहासिक दृष्टिकोण से बल्कि सांस्‍कृतिक और धार्मिक महत्‍व के कारण भी पौराणिक इतिहास का जीवंत साक्षी रहा है।  साहित्यिक श्रोतों में जिन 16 महाजन पदों का उल्‍लेख मिलता है, उनमें अंग प्रदेश के कई स्‍थान सर्वोपरि माना गया है।  जैन व बौद्ध साहित्‍य में अंग प्रदेश के कई नगरों के उत्‍थान के आवश्‍यक जिक्र मिलते हैं।  पालि साहित्‍य में भी अंग देश का उल्‍लेख है।  अंगुत्तर निकाय में भी अंग जनपद का उल्‍लेख मिलता है।  इस धरती पर जैन व बौद्धकालीन अनेक अवशेष सुरक्षित है एवं कई को सहेजने की आवश्‍यकता है।  अंग की राजधानी चम्‍पा जैन धर्म का सबसे बड़ा केन्‍द्र माना जाता है, प्राचीन चम्‍पा जिसे वर्त्तमान या आधुनिक नाथनगर के नाम से जानते हैं, जैन धर्माबलंबियों का विशिष्‍ट केन्‍द्र है।  प्राचीन इतिहास की बात करें तो विम्लिसार ने अंग के शासक वहनदत्त को पराजित कर उसको अपने साम्राज्‍य में मिला लिया था।  राजपूत राजवंशों के अभ्‍यूदय में पालवंश के संस्‍थापक गोपाल थे, इसकी राजधानी अंग नगरी मुंगेर हीं थी, पालवंश के महान शासक धर्मपाल ने विक्रमशिला विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना की थी।  पालवंश की शासन व्‍यवस्‍था का मुख्‍य केन्‍द्र अंग की भूमि हीं मानी जाती है।

अंग की समृद्धशाली व गौरवशाली इतिहास के अन्‍य पहलुओं की बात की जाय तो अंगराज दानवीर कर्ण की इस विरासत पर रामायणकालीन, महाभारत कालीन, जैन व बौद्धकालीन सहित मुगलकाल से जुड़े अनेक तथ्‍य व अवशेष के प्रमाण सार्थक रूप से प्रमागिक होने के संकेत देते हैं।  प्राचीन इतिहास के वास्‍तविक धरोहर के रूप में विक्रमशीला विश्‍वविद्यालय अंतीचक में मौजूद है- कर्ण चौड़ा मुंगेर में, भीमबांध खड़गपुर में, मंदार पर्वत किवंदतियों के अनुसार देवता और राक्षसों के बीच समुन्‍द्र मंथन के प्रत्‍यक्ष मूक प्रमाण है।

अंग की धरती पर अनेक धार्मिक धरोहर विद्यमान है, विशेष रूप से यह शिव की भूमि है। बूढ़ानाथ, मनसकामना नाथ, बटेश्‍वरनाथ, भदवेश्‍वरनाथ, अजगैवीनाथ, बासुकीनाथ, देवघर, जैठोरनाथ,  पंचवदन स्‍थान, देवघरा मंदिर आदि प्रमुख शिवमंदिरों की लंबी श्रृँखला इस पवित्र भूमि पर स्‍थापित है। विहुला विषहरी की पूजा लोक परंपराओं के अनुकूल यहाँ की विशिष्‍ट देन है।

कला और संस्‍कृति की बात की जाय तो मंजूषा कला अंग की प्रचलित कलात्‍मक अभिव्‍यक्ति को उजागर करता है।  अंगिका यहाँ की प्रचलित बोल-चाल की भाषा है, लोक गायन ने अंगिका लोकगीत, लोरकायन गायन शैली प्रमुख रूप से अंग की संस्‍कृति को क्षितिज पर स्‍थापित करता दिखता है।

लिहाजा अंग की वैभवशाली संस्‍कृति एवं इतिहास के दायरे सीमित नहीं है, बल्कि हर क्षेत्र में अंग की वास्‍तविक स्‍वरूप की झलक मिलती है।  अंग की पौराणिक इतिहास जितनी समृद्ध रही है, वहीं नवीन इतिहास इससे सबक लेता दिख रहा है।

यहाँ बोली जाने वाली भाषा अंगिका के नाम से जानी जाती है.अंगिका मुख्य रूप से प्राचीन अंग यानि भारत के उत्तर-पूर्वी एवं दक्षिण बिहार, झारखंड, बंगाल, आसाम, उङीसा और नेपाल के तराई के इलाक़ों मे बोली जानेवाली भाष��� है। यह प्राचीन भाषा कम्बोडिया, वियतनाम, मलेशिया आदि देशों में भी प्राचीन समय से बोली जाती रही है। अंगिका भाषा आर्य-भाषा परिवार का सदस्य है और भाषाई तौर पर बांग्ला, असमिया, उड़िया और नेपाली, ख्मेर भाषा से इसका काफी निकट का संबंध है। प्राचीन अंगिका के विकास के शुरूआती दौर को प्राकृत और अपभ्रंश के विकास से जोड़ा जाता है। लगभग 4 से 5 करोड़ लोग अंगिका को मातृ-भाषा के रुप में प्रयोग करते हैं और इसके प्रयोगकर्ता भारत के विभिन्न हिस्सों सहित विश्व के कई देशों मे फैले हैं। भारत की अंगिका को साहित्यिक भाषा का दर्जा हासिल है। अंगिका साहित्य का अपना समृद्ध इतिहास रहा है और आठवीं शताब्दी के कवि सरह या सरहपा को अंगिका साहित्य में सबसे ऊँचा दर्जा प्राप्त है। सरहपा को हिन्दी एवं अंगिका का आदि कवि माना जाता है। भारत सरकार द्वारा अंगिका को जल्द ही भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में भी शामिल किया जाएगा।

प्राचीन समय में अंगिका भाषा की अपनी एक अलग लिपि,अंग लिपि भी थी